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ऐसे में कांग्रेस के लिए इस बार इस सीट को बचा पाना भी बहुत कठिन लग रहा है; और टीएमसी ने ज्यादा जोर लगाया तो कमल खिलना असंभव भी नहीं है
कोलकाता। टीएमसी ने एकला चलो का ऐलान करके कांग्रेस की दबाव वाली राजनीति की लुटिया डुबो देने वाला दांव चल दिया है। कांग्रेस के पास अभी बंगाल में दो लोकसभा सीटें हैं- बहरामपुर और मालदा दक्षिण। लेकिन, इस बार उसके लिए ये सीटें जीतना आसान नहीं रहने वाला है। इन दोनों सीटों का सियासी समीकरण कांग्रेस पार्टी के लिए इस बार बिना टीएमसी के समर्थन से मुश्किलें खड़ी कर सकता है। कांग्रेस और लेफ्ट ने गठबंधन भी कर लिया तो इससे इन दोनों ही सीटों पर कांग्रेस को कुछ खास फायदा होगा, इसकी संभावना नहीं के बराबर है। पहले बहरामपुर लोकसभा सीट की बात कर लेते हैं।
मुर्शिदाबाद जिले की बहरामपुर लोकसभा सीट से अभी कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष और लोकसभा में पार्टी के नेता अधीर रंजन चौधरी सांसद हैं। करीब 66' मुस्लिम वोटर वाले इस चुनाव क्षेत्र से चौधरी 1999 से लगातार जीतते आ रहे हैं। शायद यही वजह है कि हाल ही में उन्होंने ममता बनर्जी की बढ़ती नाराजगी की खबरों को लेकर कहा था, मुझे परवाह नहीं है। हमारे नेताओं ने इस मुद्दे पर बात की है। मैं चुनाव लड़कर और जीतकर यहां तक पहुंचा हूं। मैं जानता हूं कि कैसे लडऩा है और कैसे जीतना है। इसकी वजह तब शायद ये रही हो कि 2019 में भी अधीर रंजन को यहां 45.43' वोट मिले थे। वहीं तृणमूल कांग्रेस को 39.23', बीजेपी को 10.99' और आरएसपी को 1.03' वोट आए थे। लेकिन, 2021 के विधानसभा चुनावों में बहरामपुर का सियासी गणित पूरी तरह से बदल गया। अब यहां कांग्रेस के लिए समीकरण बिगड़ चुके हैं। क्योंकि, इस लोकसभा सीट में कुल 7 विधानसभा क्षेत्र हैं, जिनमें से पिछली बार 6 टीएमसी ने जीत ली थी और 1 पर बीजेपी ने कब्जा किया था। जबकि कांग्रेस के हाथ खाली रह गए थे।
मुर्शिदाबाद में लोकसभा की कुल तीन सीटें हैं- जंगीपुर, मुर्शिदाबाद और बहरामपुर। इनमें से पहली दोनों सीटें तृणमूल के पास हैं। जानकारी के मुताबिक हाल ही में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बंद कमरे में हुई एक बैठक में पार्टी नेताओं को आदेश दिया था कि वह इस बार चौधरी की सीट भी हर हाल में जीतना चाहती हैं। वहीं मालदा दक्षिण लोकसभा सीट से कांग्रेस के अबू हसीम खान चौधरी सांसद हैं। पूर्व केंद्रीय मंत्री को पिछली बार इस सीट पर सिर्फ 34.71' वोट मिले थे।
जबकि, सत्ताधारी टीएमसी के उम्मीदवार ने भी 27.45' वोट जुटा लिया था। लेकिन, 60' मुस्लिम बहुल सीट पर भी बीजेपी की श्रीरूपा मित्रा चौधरी मुस्लिम प्रत्याशी से महज करीब 8 हजार वोटों से ही हारी थीं। उन्हें 34.07' वोट मिले थे। यहां लेफ्ट उम्मीदवार का कोई रोल नजर नहीं आया। ऐसे में कांग्रेस के लिए इस बार इस सीट को बचा पाना भी बहुत कठिन लग रहा है; और टीएमसी ने ज्यादा जोर लगाया तो 'कमलÓ खिलना असंभव भी नहीं है। मतलब, अगर कांग्रेस को ममता बंगाल में ये दोनों सीटें भी देने को राजी हो जातीं तो फायदा शायद कांग्रेस को ही मिल सकता था।